भारत राष्ट्र के सर्वोच्च पद का नाम ‘राष्ट्रपति’ नहीं, ‘राष्ट्राध्यक्ष’ सही
‘ इण्डिया दैट इज भारत’ के संविधान स शासित अपना देश अब पुनः ‘भारत’ होने के राजनीतिक पुरुषार्थ से समर्थ होता दिख रहा है । अंग्रेजी औपनिवेशिक स्थापनाओं के वे तमाम अवशेष जो वर्ष १९४७ के बाद भी जड्वत कायम रहे और दासता की स्मृति के रुप में हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान को मुंह चिढाते रहे , सो एब एक-एक कर अब इतिहास की मिट्टी में मिलते जा रहे हैं, या यों कहिए कि मिलाये जा रहे हैं । विदेशी आक्रान्ताओं के नाम पर कायम शहरों के अभारतीय नाम बदल कर उनके भारतीय नाम पुनः प्रतिष्ठित करने का सिलसिला तो बीते कई वर्षों से चल ही रहा है ; किन्तु भाजपा-मोदी सरकार इधर औपनिवेशिक शासकों द्वारा स्थापित विभिन्न संस्थानों के नाम बदल कर उन्हें भारतीय अर्थ के नाम प्रदान करने का जो काम कर रही है, सो न केवल औपनिवेशिकता से मुक्ति का एक उपक्रम है, अपितु राष्ट्रीय अस्मिता के जागरण का पर्याय भी है । देश की राजधानी- नई दिली के राजपथ को कर्त्तव्य पथ घोषित किये जाने के बाद अब राष्ट्रपति भवन परिसर के ‘मुगल गार्डन’ को ‘अमृत वन’ तथा केन्द्रीय सचिवालय को ‘कर्त्तव्य भवन’ और प्रधान मंत्री आवास जाने वाले ‘सात रेसकोर्स रोड’ को ‘लोककल्याण मार्ग’ नाम दिया जाना ऐसा ही परिवर्तन है । अब खबर यह भी है कि भारत सरकार ने देश के सभी राज्यों में वहां के राज्यपालों के आवास को राजभवन के बजाय ‘लोकभवन’ कहे जाने का अध्यादेश जारी कर दिया है । इसके साथ ही प्रधानमंत्री कार्यालय, जो कल तक पीएमओ हाउस कहलाता था, उसे अब ‘सेवातीर्थ’ नाम प्रदान किया गया है । परिवर्तन और स्वदेशीकरण का यह क्रम अभी आगे भी चलेगा और चलते रहना अपेक्षित भी है । अपेक्षित इस कारण से है क्योंकि देश के लोकतंत्र व शसनतंत्र में अभी भी कई ऐसे नाम विद्यमान हैं, जो अनुचित-अवांछित व अनर्थकारी प्रतीत होते हैं । ‘राष्ट्रपति’ एक ऐसा ही पदनाम है । राष्ट्रपति शब्द अंग्रेजी के ‘प्रेसीडेण्ट’ शब्द के अर्थ में प्रयुक्त होता है, जिसका अर्थ है- ‘अध्यक्ष’ , न कि ‘पति’ ; जबकि ‘पति’ और ‘अध्यक्ष’ दो भिन्नार्थी शब्द हैं, समानार्थी तो कतई नहीं हैं । अंग्रेजी का ‘प्रेसीडेण्ट’ शब्द कहीं से भी
हिन्दी-संस्कृत के ‘पति’ शब्द का अर्थ प्रकट नहीं करता है । प्रेसीडेण्ट का हिन्दी-संस्कृत-अनुवाद ‘अध्यक्ष’ ही है, पति या राष्ट्रपति तो कतई नहीं । इसे ऐसे भी समझें कि प्रायः किसी भी संगठन के, या यों कहिए कि सभी संगठनों के सर्वोच्च पदाधिकारी अथवा सबसे प्रमुख या मुख्य कार्यकारी अधिकारी को हिन्दी में अध्यक्ष एवं अंग्रेजी में ‘प्रेसीडेण्ट’ कहा जाता है, जिससे राष्ट्रपति का बोध किसी भी दृष्टिकोण से नहीं होता है । ऐसे में ‘प्रेसीडेण्ट ऑफ इण्डिया’ को भारत का राष्ट्रपति , अथवा भारत राष्ट्र के सर्वोच्च पदधारी शासक-नियामक व्यक्ति को ‘इण्डिया दैट इज भारत का प्रेसीडेण्ट कहा जाना सर्वथा अनुचित है । यह राष्ट्रपति शब्द ‘राष्ट्र-प्रमुख’ बोधक ‘प्रेसीडेण्ट’ के बदले हिन्दी-अनुवाद के तौर पर प्रयुक्त होता है , किन्तु वास्तव में यह सार्थक हिन्दी-अनुवाद है नहीं । प्रेसीडेण्ट का सार्थक हिन्दी-अनुवाद तो अध्यक्ष ही है, जो सामान्यतः किसी भी संस्था-संगठन में सर्वोच्च पदधारी के लिए प्रयुक्त होता भी है । किन्तु ‘राष्ट्राध्यक्ष’ अर्थात ‘प्रेसीडेण्ट ऑफ नेशन’ के
लिए हिन्दी में इसे तभी से ‘राष्ट्रपति’ कहा जाने लगा है , जबसे हमारा
देश अंग्रेजों की बुद्धिबाजी से निर्मित संविधान के द्वारा शासित-संचालित
हो रहा है । अंग्रेजी में लिखित हमारे देश के संविधान में राष्ट्र-प्रमुख
के लिए ‘प्रेसीडेण्ट’ नामक पद का प्रावधान किया गया है , जिसे संविधान के
प्रभावी होने के बाद से ही हिन्दी में ‘राष्ट्रपति’ कहा जाता रहा है ।
प्रेसीडेण्ट शब्द का प्रयोग पहली बार किसी लोकतांत्रिक देश के शासक के लिए अमेरिका में शुरू हुआ, जब वहां जॉर्ज वाशिंगटन सत्तासीन हुए । यह शब्द फ्रेंच व लेटिन भाषा के मिले-जुले प्रभाव से बना है । इसके दो अर्थ हैं – अध्यक्षता करने वाला, यानि किसी सभा को संचालित करने वाला और सेना को संचालित (कमाण्ड) करने वाला । ‘कोलिंस’ डिक्शनरी में भी प्रेसीडेंट शब्द का अर्थ किसी देश का सर्वोच्च शासनिक पद ही है । फिर अमेरिका की देखा-देखी दुनिया में जहां भी लोकतंत्र स्थापित हुआ, वहां देश में शीर्ष पद को प्रेसीडेंट कहा जाने लगा । यहां तक तो ठीक है, किन्तु उस प्रेसीडेण्ट को हिन्दी में राष्ट्रपति (राष्ट्र का पति) कहा जाना अनुचित है । क्योंकि, हिन्दी में ‘पति’ शब्द का अर्थ ‘मालिक’ , ‘स्वामी’ , ‘पभु’
, ‘ईश्वर’ अथवा ‘स्त्री का विवाहित पुरुष’ होता है ; जो किसी राष्ट्र के
लिए न उपयुक्त है , न अपेक्षित । ऐसा इस कारण भी , क्योंकि राष्ट्र न कोई वस्तु है , न कोई सम्पति , जिसका कोई मालिक या स्वामी हो; जबकि लोकतांत्रिक शासन- व्यवस्था में राष्ट्र का सर्वोच्च शासक-नियामक व्यक्ति
कोई ‘तानाशाह’ प्रभु अथवा ईश्वर नहीं होता है, जिसे राष्ट्र का पति कहा जाये । जबकि, चुनावी लोकतंत्र में तो कोई स्त्री भी राष्ट्रपति बन सकती है
, बनती ही रही है । अपने देश में जब पहली बार एक स्त्री (प्रतिभा पाटिल)
राष्ट्रपति निर्वाचित हुई, तब यह चर्चा आम हो गई थी कि एक स्त्री को भला राष्ट्रपति कैसे कहा जाएगा, जबकि
‘राष्ट्रपत्नी’ कहना अनुचित होगा, क्योंकि इस नाम का तो कोई पद ही नहीं है । और यह भी कि अपने देश में जब ‘राष्ट्रपति’ के
साथ-साथ ‘राष्ट्रपिता’ भी हैं, तो ‘राष्ट्रमाता’ का
भी एक पद सृजित कर देना चाहिए , ताकि अगर कोई स्त्री महात्मा गांधी के समान महान हो जाए , तो उसके पद को ले
कर कोई असमंजस न हो ; वह ‘राष्ट्रमाता’ ही कहलाये ।
तब मुझे यह लिखना पडा था कि देश का ‘प्रथम नागरिक’ स्त्री या
पुरुष कोई भी हो , उसे भारतीय संविधान के अनुसार राष्ट्रपति ही कहा जाएगा
; जबकि हिन्दी भाषा-व्याकरण के अनुसार वह पुरुष भारत ‘का’ राष्ट्रपति
कहलाएगा और वह स्त्री भारत ‘की’ राष्ट्रपति कहलायगी । बावजूद इसके, वह व्यक्ति भारत ‘का’ हो या ‘की’ हो उसे ‘राष्ट्रपति’ कहना इस सनातन राष्ट्र के प्रति अपमानजनक दुर्व्यवहार है । यह दुर्व्यवहार वस्तुतः ‘राष्ट्र’ की अमेरिकन-युरोपियन अवधारणा को अपना लेने के कारण
हो रहा प्रतीत होता है । युरोपियन-अमेरिकन राष्ट्र असल में राजनीतिक उद्यम
का भौगोलिक साधन है और राजसत्ता उसका साध्य है । जबकि भारतीय दृष्टि का
राष्ट्र तो राज्य की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का भावात्मक विस्तार है ।
यहां राजसत्ता साधन है, राष्ट्र उसका साध्य ; जिसका उद्देश्य है
विश्व-कल्याण । यहां राष्ट्र कोई भौगोलिक सम्पदा नहीं है, जिसका कोई
मालिक , स्वामी अथवा पति हो । यह ऐसा सीमित परिवार भी नहीं है , जिसका
माता-पिता अथवा पति हो ; बल्कि भारतीय राष्ट्र की परिकल्पना में तो समस्त
विश्व-वसुधा ही एक परिवार है- ‘वसुधैव कुटुम्बकम’, जिसका कोई व्यक्ति
विशेष माता-पिता हो ही नहीं सकता । यहां राष्ट्र तो विश्व-कल्याण का एक
भाव है , ध्येय है , पथ और पाथेय है , जो भौगोलिक सीमाओं से परे है ।
भारत में सैकडों राज्यों और राजाओं के होने के बावजूद , सदियों-सदियों से
सबका राष्ट्र एक ही रहा है- ‘भारतवर्ष’ । क्योंकि, राज्यों और राजाओं की
विभिन्नताओं के बावजूद ‘आसेतु-हिमाचल’ एक ही संस्कृति का व्याप होने के
कारण यह समस्त भू-प्रदेश एक ही राष्ट्र रहा है । यहां इस राष्ट्र-भाव के
जागरण-रक्षण-पोषण के लिए वेद-विदित ‘पुरोहित’ हुआ करते हैं- ‘वयं
राष्ट्रे जाग्रयाम पुरोहिता’ । यहां राष्ट्र एक यज्ञ है और यज्ञ एक
कल्याणकारी आयोजन है , जिसे क्रियान्वित-सम्पादित करने-कराने वाले को यजमान और पुरोहित कहा जाता रहा है । ऐसे में इस राष्ट्र के लिए किसी पिता , पति
अथवा माता , भ्राता या मालिक , ईश्वर न अभीष्ट हो सकते हैं , न
अपेक्षित । अतएव, वर्तमान लोकतांतिक और सांगठनिक व्यवस्था में राष्ट्र का
प्रतिनिधित्व करने वाले राष्ट्र-प्रमुख के लिए तो सिर्फ और सिर्फ एक ही
शब्द सही व उपयुक्त है और वह है- ‘राष्ट्राध्यक्ष’ अर्थात राष्ट्र का अध्यक्ष ।
मालूम हो कि ‘अध्यक्ष’ को ही अंग्रेजी में ‘प्रेसीडेण्ट’
कहते हैं । भारत के राष्ट्रपति को भी अंग्रेजी में प्रेसीडेण्ट ही कहते
हैं । दुनिया के सभी देशों के राष्ट्राध्यक्ष अंग्रेजी में प्रेसीडेण्ट
ही कहे जाते हैं । इतना ही नहीं , तमाम संगठनों के प्रमुख भी अंग्रेजी
में ‘प्रेसीडेण्ट’ और हिन्दी में ‘अध्यक्ष’ ही कहे जाते हैं । न
कांग्रेस के प्रमुख अथवा प्रेसीडेण्ट ‘कांग्रेस-पति’ कहलाते हैं , न
भाजपा के प्रमुख अथवा प्रेसीडेण्ट ‘भाजपा-पति’ ; तो फिर किसी गणराज्य अथवा राष्ट्र का प्रेसीडेण्ट ही ‘राष्ट्रपति’ क्यों कहलाए , यह समझ से परे है । संगठनों
के परिप्रेक्ष्य में हालांकि उनके प्रमुख कर्यकारी के लिए कहीं-कहीं
‘सभापति’ शब्द का प्रचलन है , किन्तु इस तर्ज पर भी राष्ट्र-प्रमुख के
लिए ‘राष्ट्रपति’ शब्द समुचित व सुसंगत प्रतीत नहीं होता है, क्योंकि
‘सभा’ तो स्त्रिलिंग शब्द है, जबकि ‘राष्ट्र’ पुंलिंग है और कोई ‘सभा’ नहीं है । इसी तरह से कांग्रेस, भाजपा, माकपा, भाकपा, आदि तमाम राजनीतिक दल , जिनके नाम के आगे ‘पार्टी’ शब्द लगा है , सो सब स्त्रीलिंग हैं ; जबकि वे सभी राजनीतिक
पार्टियां जिनके नाम के आगे ‘दल’ शब्द लगा है , सो सब पुंलिंग हैं ।
बावजूद इसके , इनमें से किसी भी पार्टी अथवा दल का प्रमुख अपने देश में
‘पति’ नहीं कहलाता है ; तो ऐसे में इन तमाम राजनीतिक संगठनों के लोगों को
इस तथ्य पर गौर करना चाहिए कि राष्ट्र-प्रमुख को ‘राष्ट्राध्यक्ष’ कहा
जाए , क्योंकि राष्ट्रपति कहना कहीं से भी उचित नहीं है ।
यह भी गौरतलब है कि ‘पति’ शब्द से जैसा कि इसका ऊपर
वर्णित अर्थ है- तानाशाही और निरंकुशता का बोध होता है , जो किसी
लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुकूल नहीं है । क्योंकि ‘पति’ नाम की संस्था
अथवा सत्ता न तो चुनाव की परिणति है और न ही जनता के पसंद की अभिव्यक्ति ।
आम तौर पर यह परिवर्तनीय तो कतई नहीं है । किसी सम्पत्ति का ‘पति’ अथवा
किसी स्त्री का ही ‘पति’ सामान्य स्थिति में पांच साल या छह साल पर न तो
बदला जाता है , न ही पुनर्चयनित होता है । आम तौर पर सम्पत्तियों का पति
वंशानुगत होता है , तो किसी स्त्री का पति उसका जीवन-साथी होता है ।
परन्तु राष्ट्र का ‘पति’ ? यह तो व्यापक निर्वाचन-प्रक्रिया के तहत चुना
जाता है और एक निश्चित अवधि के अन्तराल पर बदला जाता है, अथवा पुनर्चयनित
होता है । ऐसे में यह जरूरी है कि भारत जैसे प्राचीन लोकतांत्रिक देश के
राष्ट्र-प्रमुख को ‘राष्ट्रपति’ के बजाय ‘राष्ट्राध्यक्ष’ कहा जाए । एक
राष्ट्र के परिप्रेक्ष्य में ‘अध्यक्ष’ शब्द ‘पति’ की तुलना में सर्वाधिक अर्थपूर्ण एवं व्यापक व गम्भीर अभिप्राय प्रदान करने वाला है ।
क्योंकि ‘अध्यक्ष’ शब्द में ‘व्यापक जनमत की अभिव्यक्ति’ का अनुगूंज और
सार्वजनिक हितों-उद्देश्यों के व्यापक संरक्षक-संवर्द्धक होने का प्रतिविम्ब
समाहित है । जबकि ‘पति’ शब्द में संकीर्णतापूर्ण अधिकारिता मात्र है ।
अध्यक्ष शब्द कर्तव्य-परायण है , किन्तु ‘पति’ शब्द अधिकार-परायण है ।
‘अध्यक्ष’ शब्द प्रतिनिधित्वकारी व नेतृत्वकारी है , जबकि ‘पति’ शब्द स्वत्वबोधक
व स्वामीत्वकारी है । ऐसे में हमारे देश के नीति-नियन्ताओं को मेरे इस
विनम्र सुझाव पर विचार करना चाहिए और यह बदलाव अगर सम्भव हो , तो भारत गणराज्य अथवा भारत राष्ट्र के
निर्वाचित प्रथम नागरिक को
सांवैधानिक व आधिकारिक रूप से ‘राष्ट्राध्यक्ष’ कहे जाने का राजकीय प्रावधान कर दिया जाए । मैं समझता हूं कि इस बदलाव में सांवैधानिक
प्रावधान कहीं से भी बाधक नहीं हो सकते , क्योंकि ‘प्रेसीडेण्ट’ शब्द का
उपयुक्त हिन्दी अनुवाद भाषा-शास्त्र का विषय है, संविधान का नहीं ।
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