रिलीजियस विस्तारवाद को जानने से पहले यह समझ लेना आवश्यक है करिलीजन जो है, सो धर्म का पर्याय-समानार्थी नहीं है । यह मजहब के समान तो है, लेकिन धर्म के समान कतई नहीं है । ‘धर्म’ के निकट तक नहीं है रिलीजन । क्योंकि, धर्म सृष्टिकर्ता-ब्रह्म से निःसृत है ; जबकि ‘रिलीजन’ ठीक इसके विपरीत किसी कपोल-कल्पित ‘अब्रह्म’ अर्थात अब्राह्म से प्रेरित है । क्रिश्चियनिटी एक रिलीजन है, तो इस्लाम एक मजहब है । इन दोनों ही अब्राह्मिक अवधारणाओं का उद्भव-स्रोत एक ही अब्रह्म अथवा अब्राह्म है । इस दृष्टि से क्रिश्चियनिटी भी एक मजहब है और इस्लाम भी एक रिलीजन है । किन्तु ये दोनों धर्म नहीं हैं । क्योंकि रिलीजन व मजहब तो क्रमशः एक-एक ‘मैसेंजर-पैगम्बर’ (कल्पित ईश्वर के इकलौता पुत्र और अंतिम दूत) के प्रति ‘फेथ’ (विश्वास) को अभिव्यक्त करने वाली पुस्तक (बाइबिल व कुरान) पर आधारित-स्थापित है ; जबकि धर्म किसी व्यक्ति के द्वारा स्थापित और किसी एक पुस्तक पर आधारित नहीं है । रिलीजन व मजहब ही ब्रह्म-विरोधी और वेद-विरोधी हैं; इस कारण ये दोनों धर्म-विरोधी हैं, अर्थात ‘अधर्म’ हैं । अंग्रेजी में और अंग्रेजी मिश्रित आम बोलचाल की भाषा में धर्म को भी रिलीजन ही कह दिया जाता है, यह अलग बात है और घोर अनुचित है । किन्तु सच यह है कि रिलीजन किसी भी कोण से धर्म का पर्याय कतई नहीं है ।
अब इसे ऐसे समझिए कि ‘राजधर्म’ व ‘राष्ट्रधर्म’ शब्द से जो अर्थ अभिव्यक्त होता है, उस अर्थ को अभिव्यक्त करने वाला अन्य कोई भी शब्द विश्व की किसी भी भाषा में उपलब्ध नहीं है । राजधर्म का अर्थ होता है- राज्य का धर्म, राजा का धर्म ; अर्थात राज्य का कर्तव्य या राजा का कर्तव्य । यहां धर्म का जो अर्थ प्रकट हो रहा है , सो ‘रिलीजन’ या ‘मजहब’ से प्रकट नहीं होता है । इसी कारण ‘राजरिलीजन’ एवं ‘राजमजहब’ नाम का कोई शब्द न किसी रिलीजियस भाषा-साहित्य में है, न किसी मजहबी भाषा-साहित्य में ; धार्मिक भाषा-साहित्य में तो हो ही नहीं सकता । ठीक इसी प्रकार से राष्ट्रधर्म अर्थात राष्ट्र के प्रति धर्म को अभिव्यक्त करने में रिलीजन व मजहब सर्वथा असमर्थ है ; तभी तो ‘राष्ट्ररिलीजन’ व ‘राष्ट्रमजहब’ अथवा ‘नेशन-रिलीजन’ और ‘नेशनमजहब’ नाम के शब्द भी किसी भाषा-साहित्य में उपलब्ध नहीं हैं । इसी प्रकार से ‘पितृधर्म’ व ‘पुत्रधर्म’ शब्द से पिता-पुत्र के जिस कर्तव्य का बोध होता है, उसे अभिव्यक्त करने में भी रिलीजन व मजहब सर्वथा असमर्थ हैं । इस तथ्य से यह सत्य स्वयं सिद्ध हो जाता है कि रिलीजन व मजहब किसी भी हालत में धर्म के समानार्थी या पर्यायवाची कतई नहीं हैं । अंग्रेजी भाषा के ‘रिलीजन’ शब्द का अर्थ अंग्रेजी शब्दकोश में भी ‘धर्म’ नहीं है; जबकि धर्म को अंग्रेजी में अभिव्यक्त करने वाला शब्द ‘धर्मा’ है, न कि ‘रिलीजन’ ।
धर्म कभी भी किसी के प्रति वैर-वैमनस्यता की प्रेरणा कतई नहीं देता, अपितु वह तो विश्व-कल्याण की भावना भरता है तथा सभी मनुष्यों को परमात्मा की संतान बताते हुए ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का बोध कराता है और तदनुसार जीवन जीने का आचार-विचार-संस्कार युक्त कर्तव्य का क्रियान्वयन सुनिश्चित करता है । जबकि रिलीजन, जो निश्चित रुप से क्रिश्चियनिटी ही है, सो गॉड को सृष्टि का निमार्ता एवं जिसस क्राईस्ट को ‘गॉड’ का इकलौता पुत्र होने का दावा करती है तथा इस आधार पर उसके अनुयायियों को ही सम्पूर्ण पृथ्वी का उतराधिकारी करार देती है और गैर-क्रिश्चियन एवं मूर्ति-पूजक प्रजा को उनकी दासता-अधीनता में रहने के लिए अभिशप्त बताती है ।
‘ईश्वर-परमेश्वर-परमात्मा’ नहीं हैं- रिलीजियस ‘गॉड’ एवं मजहबी ‘खुदा’- रिलीजन में ‘गॉड’ की जो धारणा है , सो ईश्वर-परमेश्वर-परमात्मा का समानार्थी नहीं है, अपितु ‘शैतान’ का प्रतिद्वंदी है । रिलीजन में ‘गॉड’ के समानान्तर ‘शैतान’ की भी एक सत्ता है, जो ‘एण्टी गॉड’ (गॉड-विरोधी) है । उस पर गॉड का कोई बस नहीं चलता , वह गॉड का शत्रु है । जाहिर है - गॉड सर्वोपरी एवं ईश्वर-परमेश्वर-परमात्मा नहीं है , बल्कि उसकी सत्ता और उसका ऐश्वर्य शैतान से सदैव बाधित रहता है । इससे भी यह प्रमाणित होता है कि ‘गॉड’ का अनुवाद ‘ईश्वर-परमेश्वर-परमात्मा’ नहीं है । तभी तो इस अनुचित अनुवाद पर आपत्ति जताते हुए महात्मा गांधी (जो ‘कट्टर’ हिन्दू नहीं थे) ने कहा है- “वे (रिलीजियस लोग) हमारे देवताओं को भी गॉड कहते हैं तथा ईश्वर-परमेश्वर-परमात्मा को भी गॉड ही कहते हैं और फिर हिन्दुओं पर अनेक ईश्वरों-परमेश्वरों को मानने का आरोप लगाते हुए हमारी विद्वेषपूर्ण निन्दा करते हैं । जबकि सच यह है कि देवता (देव-शक्तियां) अनेक हैं , किन्तु ईश्वर-परमेश्वर-परमात्मा एक और अद्वितीय है ।” रिलीजन का ‘गॉड’ , जिसे बाइबिल के ‘ओल्ड टेस्टामेण्ट’ में ‘यहोवा’ कहा गया है , सो कण-कण में व्याप्त ‘सर्वव्यापी-समदर्शी ईश्वर-परमेश्वर’ नहीं है, क्योंकि वह तो उसके इकलौता पुत्र- जिसस क्राईस्ट के अनुयायियों-ईसाइयों को ही स्वर्ग-सुख देता है और गैरों-अन्यों को नरक की यातनायें देता है ; अर्थात वह मनुष्य-मनुष्य में भेद करता है । गॉड जलनशील (ईर्ष्यालु) है, क्योंकि वह यीसु (जिसस क्राईस्ट) के अतिरिक्त अन्य किसी देव या दिव्य सत्ता की उपासना करने वालों से द्वेष करता है, उन्हें दण्डित करता है ।
धर्म के मौलिक तत्वों से सर्वथा वंचित है रिलीजन- धर्म तो मानवेत्तर प्राणियों के प्रति भी दया भाव जगाता है- गायों को मातृवत सम्मान देना तथा सर्पों की भी पूजा करना सिखाता है ; जबकि रिलीजन और मजहब अन्य प्राणियों के मांसाहार के साथ-साथ गौमांस-भक्षण को भी वाजीब करार देता है । व्यष्टि से ले कर समष्टि तक सब के कल्याणार्थ, जो मानवोचित आचरण है, सो धर्म है ; किन्तु रिलीजन व मजहब इस भाव से सर्वथा शून्य हैं । धर्म केवल विश्वास और आस्था मात्र नहीं है, अपितु विज्ञान-सम्मत विश्वास व श्रद्धाजनित आस्था से युक्त सर्वकल्याणकारी मानवोचित नैतिक आचरण एवं कर्त्तव्य की अवधारणा है धर्म ; जो दस तत्वों से निर्धारित-परिभाषित हुआ है- सत्य, संयम, क्षमा, अहिंसा, तप, दान, शौच, शांति, अस्तेय, ब्रह्मचर्य । इनमें से एक-आध को छोड, अधिकतर तत्व न रिलीजन में हैं, न मजहब में ; तो उन्हें धर्म कैसे कहा जा सकता है ? ‘धर्म’ सर्वकल्याणकारी मानवोचित कर्त्तव्यों, नैतिकताओं, वर्जनाओं का समुच्चय और ब्रह्माण्ड एवम ब्रह्म को जानने तथा उससे एकाकार होने की आध्यात्मिक विद्या है, जो ब्रह्म से ही निःसृत है ; जबकि ‘रिलीजन’ व ‘मजहब’ कोरे विश्वास पर आधारित मानवकृत हैं, अध्यात्म विद्या से रहित हैं और वैश्विक प्रभुत्व कायम करने के उपकरण मात्र हैं । ‘धर्म’ धारण किये जाने वाले गुणों का समुच्चय है , दूसरों पर थोपे जाने वाले निजी ‘फेथ’ या ‘अंध-विश्वास’ का पिटारा नहीं है ।
जबरिया विस्तार पाता रिलीजन और विस्तारवादी मिशन- ज्ञातव्य है कि रिलीजन का विस्तार इसके प्रति ‘फेथ’ करने वालों के द्वारा इसे गैरों पर जबरिया थोपने से हुआ है । इसके लिए वे हिंसा-आतंक-अत्याचार बरपाते रहे हैं , जिन्हें रिलीजन की भाषा में ‘क्रूसेड’ कहा जाता है । रिलीजियस लोग (अर्थात यीसाई) ‘बाइबिल’ नामक अपनी तथाकथित ‘आसमानी किताब के आधार पर उस विस्तारवाद को उचित बताते रहे हैं , अर्थात जस्टिफाई करते हैं । रिलीजियस मान्यता यह है कि बाइबिल में ‘गॉड’ ने करार किया हुआ है कि वह केवल उन्हीं को स्वर्ग प्रदान करेगा, जो जिसस क्राईस्ट को उसका इकलौता पुत्र मानेंगे और उसकी शरण में जाएंगे, अर्थात चर्च के आदेशों का अनुपालन करेंगे । बाइबिल के अनुसार पृथ्वी और इसके तमाम सुख-साधन-संसाधन केवल यीसाइयों के भोग हेतु उपलब्ध हैं , अन्य लोग जो क्राईस्ट को नहीं मानते वे पापी हैं , इस कारण वे नरक की आग में जलने और उनकी (यीसाइयों की) अधीनता में रहने को अभिशापित हैं । इसी मान्यता के आधार पर उनने दुनिया के अनेक देशों को अपना उपनिवेश बनाया और वहां के मूल निवासियों को गुलाम बनाया । बाइबिल-वर्णित उक्त करार यीसाइयों का कर्तव्य है कि वे सारी दुनिया का यीसाइकरण करें तथा सबको इस आस्था के अधीन लायें कि गॉड का इकलौता पुत्र यीसु है और चर्च के जरिये यीसु की पवित्र प्रेतात्मा (होली घोस्ट) इस बावत सदा साक्षी रहती है कि कौन यीसु के सिवाय अन्य किसी को भी गॉड का पुत्र मानता है , जिसे नरक भेजा जाएगा । गॉड का आदेश है कि सब लोग उसके इकलौते पुत्र- जिसस क्राइस्ट (यीसु) एवं उसके चर्च में यकीन लायें , अर्थात सभी को यीसाई बन जायें, अन्यथा जबरिया बना दिये जाएं । बाइबिल की इस प्रेरणा से रिलीजन का विस्तार करना ही रिलीजियस विस्तारवाद है , जिसके तहत सारी दुनिया भर में नॉन-रिलीजियस एवं मूर्तिपूजक धार्मिक लोग लूट-मार , हिंसा-आगजनी, उत्पीडन-उपनिवेशीकरण के शिकार होते रहे हैं । ‘Jesus Christ: An Artifice for Aggression’ के लेखक स्व.सीताराम गोयल ने यहूदियों के व्यापक नरसंहार को रिलीजियस विस्तारवाद से ही प्रेरित सिद्ध किया है । वे लिखते हैं- “ यहूदियों को ‘शैतान की औलाद’ बता कर उनका सामूहिक संहार सिर्फ इसीलिए किया गया, क्योंकि वे लोग यीसु को ‘मसीहा’ मानने से इंकार कर दिये थे । बाद के ईसाई-साहित्य ने उनको ‘यीसु के हत्यारे’ के तौर पर स्थायी अपराध-भाव से भर दिया । यहूदियों को सारे यूरोप में सदियों तक गैर-नागरिक बनाए रखा गया और उन्हें लगातार विभिन्न हत्याकाण्डों का शिकार बनाया जाता रहा ।” फ्रांसिसी लेखक और दार्शनिक वोल्तेयर ने क्रिश्चियनिटी नामक रिलीजन के इतिहास और चरित्र का अध्ययन करने के बाद टिप्पणी की हुई है- “क्रिश्चियनिटी विश्व पर थोपा गया सबसे हास्यास्पद, ‘एब्सर्ड’ और रक्तरंजित रिलीजन है । हर संवेदनशील व्यक्ति को इस रिलीजन से डरना चाहिए । ईसाइयत ने काल्पनिक सत्य के लिए धरती को रक्त से नहला दिया ।” उनकी यह बात शत-प्रतिशत खरी है । इस प्रसंग में सबसे खास बात यह है कि हिंसा और घृणा का यह विस्तारवादी अभियान सदैव ही सम्बन्धित राज-सत्ता से संपोषित रहा है ।
भारत में मजहब का आतंक एवं रिलीजन का षड्यंत्र- कई शताब्दियों तक भीषण रक्तपात मचाने के बाद एशिया के अनेक देशों को रौंदते हुए मजहबी जिहाद का खूनी बवण्डर भारत पहुंच कर एक प्रकार से धराशायी हो गया था । भारत को दारुल-इस्लाम में तब्दील नहीं कर सका, बल्कि उल्टे सनातन धार्मिक रंग में रंगाने लगा था । तब मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली को यह लिखना पडा कि “वो दीन ए हिजाजी का बेबाक बेडा…निशां जिसका अक्साए आलम में पहुंचा…मजाहम हुआ कोई खतरा न जिसका…न अम्मां में ठिठका न कुलजम में झिझका…किये पै सिपर जिसने सातों समंदर…वो डुबा दहाने में गंगा के आ कर” ।
अर्थात, जिहाद का वह ‘बेबाक बेडा’ रोम तुर्की स्पेन सिरिया मिस्र फारस (ईरान-ईराक) आदि अनेक देशों की सभ्यताओं को इस्लाम में तब्दील करते हुए भारत पहुंच सलतनत कायम कर सैकडों वर्षों तक आतंक बरपाता रहा और विविध मठों-मंदिरों पर अपनी पाश्विकता के आघात से मजहबी शक्ल चस्पां करते-करते अंततः थक-हार कर शिथिल पड गया । तब सदियों बाद समन्दर पार की पश्चिमी दुनिया से ‘रिलीजियस क्रूसेड’ भी उपनिवेशवाद का रुप धारण कर अमेरिका-अफ्रीका, आस्ट्रेलिया की सभ्यताओं-संस्कृतियों को मटियामेट करते हुए भारत आ धमका । उसके झण्डाबरदारों ने छल-छद्म के सहारे शासनिक सत्ता तो कायम कर लिया, किन्तु धर्मधारी भारत राष्ट्र की सभ्यता-संस्कृति व राष्ट्रीयता को मिटा पाने और इसे ‘क्रूस के अधीन’ कर पाने में वे विशेष प्रगति नहीं कर सके । तब उन्हें मौलाना हाली के उपरोक्त नज्म का अर्थ समझ में आ गया । वे इस्लाम की असफलता से यह जान गये कि भारत को जीतने के लिए सैनिक नहीं, बौद्धिक स्तर के असैनिक उद्यम करने होंगे । जाहिर है- उनने पुस्तकालयों-ग्रन्थालयों में आग लगाने की इस्लामी मूर्खता का अनुकरण करने के बजाय पुस्तकों-ग्रन्थों में सेंध मारने की बौद्धिकता का अनुसरण किया । इसी उद्यम के तहत उन रिलीजियस विस्तारवादियों ने भारतीय ज्ञान-विज्ञान धर्म-दर्शन-अध्यात्म को समझने और उन्हें क्रिश्चियनिटी के सांचे में ढालने के लिए संस्कृत-शास्त्रों-ग्रंथों का अध्ययन-विश्लेषण करने तथा अपनी रिलीजियस आवश्यकताओं के अनुसार उन्हें अनुवादित-प्रक्षेपित करने और उनके आधार पर किसिम-किसिम के आख्यान रचने-गढने का एक बहुआयामी षड्यंत्रकारी अभियान ही खडा कर दिया, जिनकी चर्चा इस पुस्तक में आगे बडे विस्तार से हुआ है ।
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